ईरान

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جمهوری اسلامی ایران
जम्हूरी-ए-इस्लामी-ए-ईरान
image:LocationIran.png
राजभाषा फारसी (فارسی)
राजधानी तेहरान
सबसे प्रमुख नेता अली खुमैनी
राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद
क्षेत्रफल
 - कुल
 - % जल
१७ वाँ स्थान
१,६४८,१९५ वर्ग कि. मी.
०.७%
जनसँख्या
 - कुल (जुलाई २००४)
 - घनत्व
१६ वाँ स्थान
६९,०१८,९२४
४२/वर्ग कि.मी.
वर्तमान सरकार का पदग्रहण
 - तिथी
इस्लामी क्रांति
१ अप्रैल, १९७९
मुद्रा रियाल
समय क्षेत्र ग्रिनविच मानक समय +३.३०
राष्ट्रगीत सरूद-ए-मिल्ली-ए-जम्हूरी-ए-इस्लामी
इंटरनेट डोमेन .ir
कालिंग कोड ९८
Image:Iran map.png

ईरान (جمهوری اسلامی ايران, जम्हूरी इस्लामी ईरान) जंबुद्वीप (एशिया) के दक्षिण-पश्चिम खंड में स्थित देश है । इसे सन १९३५ तक फारस नाम से भी जाना जाता है । इसकी राजधानी तेहरान है और यह देश उत्तर-पूर्व में तुर्कमेनिस्तान, उत्तर में कैस्पियन सागर और अज़रबैजान, दक्षिण में फारस की खाड़ी, पश्चिम में इराक और तुर्की , पूर्व में अफ़ग़ानिस्तान तथा पाकिस्तान से घिरा है । यहां का प्रमुख धर्म इस्लाम है तथा यह क्षेत्र शिया बहुल है ।

प्राचीन काल में यह बड़े साम्राज्यों की भूमि रह चुका है । ईरान को १९७९ में इस्लामिक गणराज्य घोषित किया गया था । यहाँ के प्रमुख शहर तेहरान, इस्फ़हान, तबरेज़, मशहद इत्यादि हैं । राजधानी तेहरान में देश की १५ प्रतिशत जनता वास करती है । ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्यतः तेल और प्राकृतिक गैस निर्यात पर निर्भर है । फ़ारसी यहाँ की मुख्य भाषा है ।

अनुक्रम

नाम

ईरान का प्राचीन नाम फ़ारस था । यह नाम फ़ारसी भाषा के बोलने वालों के लिए प्रयोग किया जाता था । फ़ारसी भाषा, आधुनिक ईरान के दक्षिण में स्थित राज्य फ़ार्स में बोले जाने वाली भाषा का विस्तार थी । धीरे धीरे यही भाषा सम्पूर्ण ईरान तथा उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में बोली जाने लगी । इसी से इस पूरे प्रदेश को फ़ारस तथा इसके प्रभाव वाले क्षेत्रों को फ़ारसी साम्राज्य का नाम मिला ।

ईरान शब्द आर्य मूल के लोगों के लिए प्रयुक्त शब्द एर्यनम से आया है जिसका अर्थ है आर्यों की भूमि । हख़ामनी शासकों के समय भी आर्यम तथा एइरयम शब्दों का प्रयोग हुआ है । ईरानी स्रोतों में यह शब्द सबसे पहले अवेस्ता में मिलता है । अवेस्ता ईरान में आर्यों के आगमन (दूसरी सदी ईसापूर्व) के बाद लिखा गया ग्रंथ माना जाता है । इसमें आर्यों तथा अनार्यों के लिए कई छन्द लिखे हैं और इसकी पंक्तियाँ ऋग्वेद से मेल खाती है । लगभग इसी समय भारत में भी आर्यों का आगमन हुआ था । पार्थियन शासकों ने एरान तथा आर्यन दोनों शब्दों का प्रयोग किया है ।

बाहरी दुनिया के लिए १९३५ तक नाम फ़ारस था । ईरान को यह नाम फ़ार्स प्रांत में बोले जाने वाली भाषा से मिला जिससे फ़ारसी भाषा विकसित हुई । सन् १९३५ में रज़ाशाह पहलवी के नवीनीकरण कार्यक्रमों के तहत देश का नाम बदलकर फ़ारस से ईरान कर दिया गया था ।

भौगोलिक स्थिति और विभाग

ईरान तीस प्रांतों में बंटा है । इनका क्षेत्रवार विवरण इस प्रकार है -

इतिहास

मुख्य लेख: ईरान का इतिहास

माना जाता है कि ईरान में पहले पुरापाषाणयुग कालीन लोग रहते थे । यहाँ पर मानव निवास एक लाख साल पुराना हो सकता है । लगभग 5000 ईसापूर्व से खेती आरंभ हो गई थी । मेसोपोटामिया की सभ्यता के स्थल के पूर्व में मानव बस्तियों के होने के प्रमाण मिले हैं । ईरानी लोग (आर्य) लगभग 2000 ईसापूर्व के आसपास उत्तर तथा पूरब की दिशा से आए । इन्होंने यहाँ के लोगों के साथ एक मिश्रित संस्कृति की आधारशिला रखी जिससे ईरान को उसकी पहचान मिली । आधिनुक ईरान इसी संस्कृति पर विकसित हुआ । ये यायावर लोग ईरानी भाषा बोलते थे और धीरे धीरे इन्होंने कृषि करना आरंभ किया ।

आर्यों का कई शाखाए ईरान (तथा अन्य देशों तथा क्षेत्रों) में आई । इनमें से कुछ मिदि, कुछ पार्थियन, कुछ फारसी, कुछ सोगदी तो कुछ अन्य नामों से जाने गए । मिदि तथा फारसियों का ज़िक्र असीरियाई स्रोतों में 836 ईसापूर्व के आसपास मिलता है । लगभग इसी समय जरथुस्ट्र (ज़रदोश्त या ज़ोरोएस्टर के नाम से भी प्रसिद्ध) का काल माना जाता है । हँलांकि कई लोगों तथा ईरानी लोककथाओं के अनुसार ज़रदोश्त बस एक मिथक था कोई वास्तविक आदमी नहीं । पर चाहे जो हो उसी समय के आसपास उसके धर्म का प्रचार उस पूरे प्रदेश में हुआ ।

असीरिया के शाह ने लगभग 720 ईसापूर्व के आसपास इसरायल पर अधिपत्य जमा लिया । इसी समय कई यहूदियों को वहाँ से हटा कर मीदि प्रदेशों में लाकर बसाया गया । 530 ईसापूर्व के आसपास बेबीलोन फ़ारसी नियंत्रण में आ गया । उसी समय कई यहूदी वापस इसरायल लौट गए । इस दोरान जो यहूदी मीदि में रहे उनपर जरदोश्त के धर्म का बहुत असर पड़ा और इसके बाद यहूदी धर्म में काफ़ी परिवर्तन आया ।

हखामनी साम्राज्य

इस समय तक फारस मीदि साम्राज्य का अंग और सहायक रहा था । लेकिन ईसापूर्व 549 के आसपास एक फारसी राजकुमार सायरस (आधुनिक फ़ारसी में कुरोश) ने मीदि के राजा के खिलाफ़ विद्रोह कर दिया । उसने मीदि राजा एस्टिएज़ को पदच्युत कर राजधानी एक्बताना (आधुनिक हमादान) पर नियंत्रण कर लिया । उसने फारस में हखामनी वंश की नींव रखी और मीदिया और फ़ारस के रिश्तों को पलट दिया । अब फ़ारस सत्ता का केन्द्र और मीदिया उसका सहायक बन गया । पर कुरोश यहाँ नहीं रुका । उसने लीडिया, एशिया माइनर (तुर्की) के प्रदेशों पर भी अधिकार कर लिया । उसका साम्राज्य तुर्की के पश्चिमी तट (जहाँ पर उसके दुश्मन ग्रीक थे) से लेकर अफ़गानिस्तान तक फैल गया था । उसके पुत्र कम्बोजिया (केम्बैसेस) ने साम्राज्य को मिस्र तक फैला दिया । इसके बाद कई विद्रोह हुए और फिर दारा प्रथम ने सत्ता पर कब्जा कर लिया । उसने धार्मिक कट्टरता का मार्ग अपनाया और यहूदियों के ख़िलाफ जनमत बनाने की चेष्टा की । यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार दारा ने युवाओं का समर्थन प्राप्त करने की पूरी कोशिश की । उसने सायरस या केम्बैसेस की तरह कोई खास सैनिक सफलता तो अर्जित नहीं की पर उसने ५१२ इसापूर्व के आसपास य़ूरोप में अपना सैन्य अभियान चलाया था । उसके बाद पुत्र खशायर्श (क्ज़ेरेक्सेस) शासक बना जिसे उसके ग्रीक अभियानों के लिए जाना जाता है । उसने एथेन्स तथा स्पार्टा के राजा को हराया पर बाद में उसे सलामिस के पास हार का मुँह देखना पड़ा जिसके बाद उसकी सेना क्षत-विक्षत हो गई । क्ज़ेरेक्सेस के पुत्र अर्तेक्ज़ेरेक्सेस ने ४६५ ईसा पूर्व में गद्दी सम्हाली । उसके बाद अर्तेक्ज़ेरेक्सेस द्वितीय तथा उसके बाद अर्तेक्ज़ेरेक्सेस तृतीय और उसके बाद दारा तृतीय । दारा तृतीय के समय तक (३३६ ईसा पूर्व) फ़ारसी सेना काफ़ी संगठित हो गी थी ।

सिकन्दर

पर इसी समय मेसीडोनिया में सिकन्दर का उदय हो रहा था । ३३४ ईसापूर्व में सिकन्दर ने एशिया माईनर पर धावा बोल दिया । दारा को भूमध्य सागर के तट पर इसुस में हार का मुँह देखना पड़ा । इसके बाद सिकंदर ने तीन बार दारा को हराया । सिकन्दर इसापूर्व ३३० में पर्सेपोलिस आया और उसके फतह के बाद उसने शहर को जला देने का आदेश दिया । सिकन्दर ने ३२६ इस्वी में भारत पर आक्रमण किया और फिर वो वापस लौट गया । ३२३ इसापूर्व के आसपास, बेबीलोन में उसकी मृत्यु हो गई । उसकी मृत्यु के बाद उसके जीते फारसी साम्राज्य को इसके सेनापतियों ने अपने में विभाजित कर लिया ।


सिकन्दर के सबसे काबिल सेनापतियों में से एक था सेल्युकस । उसका नियंत्रण मेसोपोटामिया तथा इरानी पठारी क्षेत्रों पर था । लेकिन इसी समय से उत्तर पूर्व में पार्थियों का विद्रोह आरंभ हो गया था । पार्थियनों ने हखामनी शासकों की भी नाक में दम कर रखा था । मित्राडेट्स ने ईसापूर्व १२३ से ईसापूर्व ८७ तक अपेक्षाकृत स्थायित्व से शासन किया । अगले कुछ सालों तक शासन की बागडोर तो पार्थिनों के हाथ ही रही पर उनका नेतृत्व और समस्त ईरानी क्षेत्रों पर उनकी पकड़ ढीली ही रही । पर दूसरी सदी के बाद से उनकी शक्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई । उन्होंने रोमन साम्राज्य को चुनौती दी और कई सालों तक उनपर आक्रमण करते रहे । सन् २४१ में शापुर ने रोमनों को मिसिको के युद्ध में हराया । २४४ इस्वी तक अर्मेनिया फारसी नियंत्रण में आ गया । इसके अलावा भी पार्थियनों ने रोमनों को कई जगहों पर परेशान किया सन् २७३ में शापुर की मृत्यु हो गई । सन् २८३ में रोमनों ने फारसी क्षेत्रों पर फिर से आक्रमण कर दिया । इसके फलस्वरूप अर्मेनिया के दो भाग हो गए - रोमन नियंत्रम वाले और फारसी नियंत्रण वाले । शापुर के पुत्रों को और भी समझोते करने पड़े और कुछ और क्षेत्र रोमनों के नियंत्रण में चले गए । सन् ३१० में शापुर द्वितीय गद्दी पर युवावस्था में बैठा । उसने ३७९ इस्वी तक शासन किया । ुसका शासन अपेक्षाकृत शांत रहा । उसने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई । उसके उत्तराधिकारियों ने वही शांति पूर्ण विदेश नीति अपनाई पर उनमें सैन्य सबलता की कमी रही । आर्दशिर ध्वितीय, शापुर तृतीय तथा बहराम चतुर्थ सभी संदिग्ध अवस्था में मारे गए । उनके वारिस यज़्देगर्द ने रोमनों के साथ शाति बनाए रखा । उसके शासनकाल में रोमनों के साथ सम्बंध इतने शांतिपूर्ण हो गए कि पूर्वी रोमन साम्राज्य के शासक अर्केडियस ने यज़्देगर्द को अपने बेटे का अभिभावक बना दिया । उसके बाद बहरम पंचम शासक बना जो जंगली जानवरों के शिकार का शोकीन था । वो ४३८ इस्वी के आसपास एक जंगली खेल देखते वक्त लापता हो गया जिसके बाद उसके बारे में कुछ पता नहीं चल सका ।

इसके बाद की अराजकता में कावद प्रथम ४८८ इस्वी में शासक बना । इसके बाद खुसरो (५३१-५७९), होरमुज़्द चतुर्थ (५७९-५८९), खुसरो द्वितीय (५९० - ६२७) तथा यज्देगर्द तृतीय का शासन आया । जब यज़्देगर्द ने सत्ता सम्हाली तब वो केवल ८ साल का था ।

इसी समय अरब, मुहम्मद साहब के नेतृत्व में काफी शक्तिशाली हो गए थे । सन् ६३४ में उन्होने ग़ज़ा के निकट बेजेन्टाइनों को एक निर्णायक युद्ध में हरा दिया । फारसी साम्राज्य पर भी उन्होंने आक्रमण किए थे पर वे उतने सफल नहीं रहे थे । सन् ६४१ में उन्होने हमादान के निकट यज़्देगर्द को हरा दिया जिसके बाद वो पूरब की तरफ सहायता याचना के लिए भागा पर उसकी मृत्यु मर्व में सन् ६५१ में उसके ही लोगों द्वारा हुई । इसके बाद अरबों का प्रभुत्व बढ़ता गया । उन्होंने ६५४ में खोरासान पर अधिकार कर लिया और ७०७ िस्वी तक बाल्ख ।

शिया इस्लाम

मुहम्मद साहब की मृत्यु के उपरांत उनके वारिस को ख़लीफा कहा जाता था जो इस्लाम का प्रमुख माना जाता था । चौथे खलीफा अली, मुहम्मद साहब के फरीक थे और उनकी पुत्री फ़ातिमा के पति । पर उनके खिलाफत को चुनौती दी गई और विद्रोह भी हुए । सन् ६६१ में अली की हत्या कर दी गई । इसके बाद उम्मयदों का प्रभुत्व इस्लाम पर हो गया । सन् ६८० में करबला में अली के दूसरे पुत्र हुसैन ने उम्मयदों के खिलाफ़ बगावत की पर उनको एक युद्ध में मार दिया गया । इसी दिन की याद में शिया मुसलमान महुर्रम मनाते हैं । इस समय तक इस्लाम दो खेमे में बट गया था - उम्मयदों का खेमा और अली के खेमा । जो उम्मयदों को इस्लाम के वास्तविक उत्तराधिकारी समझते थे वे सुन्नी कहलाए और जो अली को वास्तविक खलीफा (वारिस) मानते थे वे शिया । सन् ७४० में उम्मयदों को तुर्कों से मुँह की खानी पड़ी । उसी साल एक फारसी परिवर्तित - अबू मुस्लिम - ने उम्मयदों के खिलाफ़ मुहम्मद साहब के वंश के नाम पर उम्मयदों के खिलाफ एक बड़ा जनमानस तैयार किया । उन्होंने सन् ७४९-५० के बीच उम्मयदों को हरा दिया और एक नया खलीफ़ा घोषित किया - अबुल अब्बास । अबुल अब्बास अली और हुसैन का वंशज तो नही पर मुहम्मद साहब के एक और फरीक का वंशज था । उससे अबु मुस्लिम की बढ़ती लोकप्रियता देखी नहीं गई और उसको ७५५ इस्वी में फाँसी पर लटका दिया । इस घटना को शिया इस्लाम में एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है क्योंकि एक बार फिर अली के समर्थकों को हाशिये पर ला खड़ा किया गया था । अबुल अब्बास के वंशजों ने कई सदियों तक राज किया । उसका वंश अब्बासी (अब्बासिद) वंश कहलाया और उन्होंने अपनी राजदानी बगदाद में स्थापित की । तेरहवी सदी में मंगोलों के आक्रमण के बाद बगदाद का पतन हो गया और ईरान में फिर से कुछ सालों के लिए राजनैतिक अराजकता छाई रही ।

सूफीवाद

अब्बासिद काल में ईरान की प्रमुख घटनाओं में से एक थी सूफी आंदोलन का विकास । सूफी वे लोग थे जो धार्मिक कट्टरता के शिकार थे और सरल जीवन पसन्द करते थे । इस आंदोलन ने फ़ारसी भाषा में अभूतपूर्व कवियों को जन्म दिया । रुदाकी, फिरदौसी, उमर खय्याम, नासिर-ए-खुसरो, रुमी, इराकी, सादी, हफीज आदि उस काल के प्रसिद्ध कवि हुए। इस काल की फारसी कविता को कई जगहों पर विश्व की सबसे बेहतरीन काव्य कहा गया है । इनमें से कई कवि सूफी विचारदारा से ओतप्रोत थे और अब्बासी शासन के अलावा कइयों को मंगोलो का जुल्म भी सहना या देखना पड़ा ता ।

पंद्रहवीं सदी में जब मंगोलों की शक्ति क्षीण होने लगी तब ईरान के उत्तर पश्चिम में तुर्क घुरसवारों से लैश एक सेना का उदय हुआ। इसके मूल के बारे में मतभेद है पर उन्होंने सफावी वंश की स्थापना की । वे शिया बन गए और आने वाली कई सदियों तक उन्होंने इरानी भूभाग और फ़ारस के प्रभुत्व वाले इलाकों पर राज किया । इस समय शिया इस्लाम बहुत फला फूला। १७२० के अफगान और पूर्वी विद्रोहों के बाद धीरे धीरे साफावियों का पतन हो गया । १७२९ में नादिर कोली ने अफ़गानों के प्रभुत्व को कम किया और शाह बन बैठा । वह एक बहुत बड़ा विजेता था और उसने भारत पर भी सन् १७३९ में आक्रमण किया और बारी मात्रा में धन सम्पदा लूटकर वापस आ गया । भारत से हासिल की गई चीज़ों में कोहिनूर हीरा भी शामिल था ।

पर उसके बाद क़जार वंश का शासन आया जिसके काल में यूरोपीय प्रभुत्व बढ़ गया । उत्तर से रूस, पश्चिम से फ्रांस तथा पूरब से ब्रिटेन की निगाहें फारस पर पड़ गईं । सन् १९०५-१९११ में यूरोपीय प्रभाव बढ़ जाने और शाह की निष्क्रियता के खिलाफ एक जनान्दोलन हुआ । इरान के तेल क्षेत्रों को लेकर तनाव बना रहा । प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की के पराजित होने के बाद ईरान को भी उसका फल भुगतना पड़ा । 1930 और 40 के दशक में रज़ा शाह पहलवी ने सुधारों की पहल की । 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई और ईरान एक इस्लामिक गणतंत्र घोषित कर दिया गया । इसके बाद अयातोल्ला ख़ुमैनी, जिन्हें शाह ने देशनिकाला दे दिया था, ईरान के प्रथम राष्ट्रपति बने । इराक़ के साथ युद्ध होने से देश की स्थिति खराब हो गई ।

आधुनिकीकरण

रजा शाह ने १९३० के दशक में इरान का आधुनिकीकरण प्रारंभ किया । पर वो अपने प्रेरणस्रोत तुर्की के कमाल फाशा की तरह सफल नहीं रह सका । उसने शिक्षा के लिए अभूतपूर्व बंदोबस्त किए तथा सेना को सुगठित किया । उसके बाद १९७९ में एक और आन्दोलन हुआ जिसका कारण धार्मिक था । इसके फलस्वरूप पहलवी वंश का पतन हो गया और अयातोल्ला खोमैनी को सत्ता मिली । उनका देहांत १९८९ में हुआ । इसके बाद से ईरान में विदेशी प्रभुत्व लगभग समाप्त हो गया ।

जनवृत्त

ईरान में भिन्न भिन्न जाति के लोग रहते हैं । यहाँ ७० प्रतिशत जनता हिन्द-आर्य जाति की है और हिन्द ईरानी भाषाएँ बोलती है । जातिगत आँकड़ो को देखें तो ५४ प्रतिशत फारसी, २४ प्रतिशत अज़री, मज़ंदरानी और गरकी ८ प्रतिशत, कुर्द ७ प्रतिशत, अरबी ३ प्रतिशत, बलोची, लूरी, और तुर्कमेन २ प्रतिशत (प्रत्येक) तथा कई अन्य जातिय़ाँ शामिल हैं ।

ईरान की जनसंख्या ७ करोड़ है और ईरान विश्व में शरणागतों के सबसे बड़े देशों में से एक है जहाँ इराक़ तथा अफ़गानिस्तान से कई शरणार्थियों ने अपने देशों में चल रहे युद्धों के कारण शरण ले रखी है ।

धर्म

ईरान का प्राचीन नाम पार्स (फ़ारस) था और पार्स के रहने वाले लोग पारसी कहलाए, जो ज़रथुस्त्र के अनुयायी थे. सातवीं शताब्दी में अरबों ने पार्स पर विजय पाई और वहाँ इस्लाम का प्रसार हुआ. उत्पीड़न से बचने के लिए बहुत से पारसी भारत आ गए.

इस्लाम में ईरान का एक विशेष स्थान है । सातवीं सदी से पहले यहाँ जरथुस्ट्र धर्म के अलावा कई और धर्मों तथा मतों के अनुयायी थे । अरबों द्वारा ईरान विजय (फ़ारस) के बाद यहाँ शिया इस्लाम का उदय हुआ । आज ईरान के अलावा दक्षिणी इराक, अफ़ग़ानिस्तान, अजरबैजान तथा पाकिस्तान में भा शिया मुस्लिमों की आबादी निवास करती है । शिया, इस्लाम के पीड़ितों, शोषितों तथा सताए गए लोगों का प्रतिनिधित्व करता है । वे इमाम हुसैन के वंशजों को इस्लाम तथा पैगंबर मुहम्मद का वास्तविक उत्तराधिकारी (ख़लीफ़ा) मानते है, उम्मयदों को नहीं । उम्मयदों के अनुयायियों को सुन्नी कहा जाता है । लगभग सम्पूर्ण अरब, मिस्र, तुर्की, उत्तरी तथा पश्चिमी इराक, लेबनॉन को छोड़कर लगभग सम्पूर्ण मध्यपूर्व, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताज़िकिस्तान तुर्केमेनिस्तान तथा भारतोत्तर पूर्वी एशिया के मुसलमान मुख्यतः सुन्नी हैं ।

अर्थव्यवस्था

ईरान की अर्थव्यवस्था तेल और प्राकृतिक गैस से संबंधित उद्योगों तथा कृषि पर आधारित है । सन् 2006 में ईरान के बज़ट का 45 प्रतिशत तेल तथा प्राकृतिक गैस से मिले रकम से आया और 31 प्रतिशत करों और चुंगियों से । ईरान के पास क़रीब70 अरब अमेरिकी डॉलर रिज़र्व में है और इसकी सालाना सकल घरेलू उत्पाद 206 अरब अमेरिकी डॉलर थी । इसकी वार्षिक विकार दर 6 प्रतिशत है । संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ ईरान एक अर्ध-विकसित अर्थव्यवस्था है । सेवाक्षेत्र का योगदान सकल घरेलू उत्पाद में सबसे ज्यादा है । देश के रोज़गार में 1.8 प्रतिशत रोजगार पर्यटन के क्षेत्र में है । वर्ष 2004 में ईरान में 16,59,000 पर्यटक आए थे । ईरान का पर्यटन से होने वाली आय वाले देशों की सूची में 89वाँ स्थान है पर इसका नाम सबसे ज्यादा पर्यटकों की दृष्टि से 10वें स्थान पर आता है ।

प्राकृतिक गैसों के रिज़र्व (भंडार) की दृष्टि से ईरान विश्व का सबसे बड़ा देश है । तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है ।


यह भी देखिए

बाहरी कड़ियां


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